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हमने खुद में पिरोया है तुम्हे एक ताबीज की तरह 
अगर हम टूट गये तो बिखर तुम भी जाओ गे 

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सुना है आज बिक रहा है इश्क़ बाज़ार में 
जाओ उस इश्क़ फरामोश से पूछो वफ़ा भी साथ देता है क्या। 

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शर्म अदा झिझक परेशानी नाज़ से काम क्यों नहीं लेती 
आप वो जी मगर

ये सब क्या है 
तुम मेरा नाम क्यों नहीं लेती 

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छत टपकती है उसके कच्चे घर की 
वो किसान फिर भी बारिश की दुआ करता है 

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वो मेरी ग़ज़ल पढ़ कर  पहेलु बदल के बोले
कोई इससे कलम छीने ये किसीकी जान लेलेगा 

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इस बार की सर्दियों में ऐसा होने पाए 
चढ़ती रहें चादरें मज़ार पर और
बाहर बैठा फ़क़ीर ठंड से मर जाए

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चमका ना करो यूँ जुगनू की तरह 
किसी दिन हाथों में छुपा कर ले जाऊं गा नहीं तो

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अगर देखनी है क़यामत तो चले आओ हमारी महफ़िल में 
सुना है आज महफ़िल में वो बेनक़ाब रहे हैं 

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जब भी टूट कर बिखरता हूँ मैं
दुगना होकर निखरता हूँ मैं

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हो जो मुमकिन  तो अपना बना लो तुम
मेरी तन्हाई गवाह हैमेरा अपना कोई नहीं

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जिनके आँगन में अमीरी के शज़र (पेड़ ) लगते हैं 
उनके हर ऐब ज़माने को हुनर लगते हैं 

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मुझे उस जगह से भी मोहब्बत हो जाती है
जहाँ बैठ कर मैं एक बार उसे सोच लेता हूँ

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हम जा रहे हैं वहां जहाँ दिल की क़दर हो 
बैठे रहो तुम अपनी अदाएं लिए हुए 

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कोशिश के बावजूद भी जो पूरी हो सके 
हाँ  तेरा नाम भीं उन्हीं ख्वाइशों में से है

 

 

वह समझता है शराफ़त को ऊन का कुर्ता
जब कड़ी धूप हो उसको उतार आता है

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मालूम हमें भी है बहुत से तेरे किस्से
पर बात तेरी हमसे उछाली नहीँ जाती 

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छोड़ो बिखरने देते हैं जिन्दगी को
आखिर समेटने की भी हद होती है

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फिर से हर बूँद में उसकी याद की लज़्ज़त ला कर 
बारिशे आग लगाने का हुनर लायी हैं  

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आतिशरंगहिना से मछलियां जलने लगी 
तुम ने धोये जो दरिया के किनारे हाथ पाँव अपने 

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हमने तो नमाजे पढी है 
अक्सर गंगा तेरे पानी से वजू कर कर

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मैखाने लाख बन्द करे जमाने वाले,
शहर में कम नहीं नजरो से पिलाने वाले

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वो कहने लगी, नकाब में भी पहचान लेते हो हजारों के बीच ?
मै ने मुस्करा के कहा, तेरी आँखों से ही शुरू हुआ थाइश्क“, हज़ारों के बीच      

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इश्क़ पर ज़ोर नहीं ,है ये वो आतिश ग़ालिब 
के लगाये लगे ,बुझाए बुझे 

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रहता हूँ जिस जंमीं पर वही ओढ़ लूंगा 
अंजाम तक पहुँचूँ गा मैं अंजाम से पहले 

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सामने बैठ के जो दिल चुराए कोई 
ऐसे चोर का पता खाक लगाये कोई 

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होंठ मिला दिए उसने मेरे होंठो से यह कह कर
अगर शराब छोड़ दोंगे तो ये जाम रोज मिलेगा

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हमदर्दियाँ जनाब मुझे काटती हैं अब
यूँ खामखाँ मिजाज ना पूछा करे कोई

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तेरी यादेंकांच के टुकड़े
और मेरा दिल नंगे पाँव

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सौ बार मरना चाहा उसकी निगाहों में डूब कर,
वो निगाहें झुका लेती है हमें मरने नहीं देती

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मोबाइल चलाना जिसे सिखा रहा हूँ मैं,
उसने मुझे दुनिया मे चलना सिखाया था 

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उसने हमारे ज़ख्मो का कुछ यूँ किया इलाज़
मरहम भी लगाया तो काटों कि नोक से ,

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यहाँ लिबास की कीमत है आदमी की नहीं,
मुझे गिलास बड़ा दे, शराब कम कर दे      

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अक्ल आई थी मशवरा देने,
इश्क़ ने मुस्कुरा के लौटा दिया

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गुज़र गया दिन अपनी तमाम रौनके लेकर 
ज़िन्दगी ने वफ़ा की तो कल फिर सिलसिले होंगे 

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सो गये बिस्तर पे वो चेहरे पे दुपट्टा डालकर
मेरे कमरे की अचानक रौशनी कम हो गयी 

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तिनका तिनका जोड़ कर बनाया था बसेरा उसने
फिर भी कमबख्त लोग कहते है खाली है झोपड़ा उसका    

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सलवटें देख चेहरे पे हैरान क्यूँ हो ?
ज़िंदगी ने मुझे तुमसे कुछ ज़्यादा पहना है

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सबके कर्जे चुका दुंगा मरने से पहले
जिंदगी बता तेरी कीमत क्या है 

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वजह पूछोगी तो उम्र गुजर जाएगी,
कहा ना कि
अच्छी लगती हो तो बस अच्छी लगती हो

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जिनसे खेलने की उम्र है उसकी 
वो उन खिलोनो को सड़क पर बेचता है
a
हमने तुम्हें चाहा है, हजारों में कहेंगे

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सनम है अगर मेरा तो मेरे नाज़ भी उठा 
रुठुंगा मैं हज़ार बार तेरी गरज तू मना 

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मुझे अपने किरदार पे इतना तो यकिन है
कोई मुझे छोड तो सकता है मगर भुला नही सकता

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उस ने उलझा दिया दुनिया में मुझे
वरना इक और क़लंदर होता

 

अभी से क्यों छलक आये तुम्हारी आँख में आंसू !
अभी छेड़ी कहाँ है, दास्तानेजिन्दगी मैंने !!

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अपना गम किस तरह से बयान करूँ !
आग लग जायेगी इस जमाने में !!

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ख़्वाबों में भी आना तेरा अब कम हो गया !
नफरतें तेरी शायद, ज़रा जोरों पर हैं !!

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एक शरारा भी आशियाँ को जला देता है !
नादां है तू शोलों को हवा देता है !!

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बड़ी बारीकी से तोडा है उसने दिल का हर कोना !
सच कहुँ मुझे तो उसके हुनर पे नाज़ होता हैं !!

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जनाब मत पूछिए हद हमारी सनकीपन की !
हम आईन कुचल कर समझते है आसमां कुचल दिया !!

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तजुर्बे ने एक बात सिखाई है !
एक नया दर्द ही !!
पुराने दर्द की दवाई है…!!!

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मतलबी दुनिया के लोग खड़े है,हाथों में पत्थर लेकर !
मैं कहाँ तक भागूं ,शीशे का मुकद्दर लेकर !!

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लहू की बारिश से भीग चुका है हमारा वतन !
मैं किस जुबाँ से कहूँ जश्नआज़ादी मुबारक हो !!

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आज आलम में है सन्नाटा तो है मेरी तलाश !
कल इसी दुनिया को शिकायत थी मेरी फरियाद से !!

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अगर मुझसे टूटा है पैमानाउल्फत !
तुम्हारी नजर क्यों झुकी जा रही है !!

 

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एक तो हुस्न बला ,उसपे बनावट तौबा !
घर बिगाड़ें गे हज़ारों के ,ये संवरने वाले !!

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ज़रा सी आहट से….वो जग जाता है रातों में !
.खुदा बेटी दे गरीब को….तो दरवाज़ा भी दे !!

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उम्र भर साँप से शर्मिन्दा रहे ये सुन कर !
जबसे इन्सान को काटा है तो फन दुखता है !!

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अच्छे लोगों को सब चाहा करते हैं !
है कोई तलबगार बहोत बुरे हैं हम !!

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मैं खुल के हँस तो रहा हूँ फ़क़ीर होते हुए !
वो मुस्कुरा भी पाया अमीर होते हुए !!

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उन घरों में जहाँ मिट्टी के घडे रहते हैं !
कद में छोटे हों मगर लोग बङे रहते हैं !!

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चाँद में बुढ़िया, बुज़ुर्गों में ख़ुदा को देखें !
भोले अब इतने तो ये बच्चे नहीं होते हैं !!

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वो कौन है जिन्हें तौबा की मिल गई फुरसत !
हमें गुनाह भी करने को ज़िंदगी कम है !!